सचिन व बैसला की नाथ की लड़ाई में फंसा गुर्जर समाज

राजस्थान में एक बार फिर गुर्जर आरक्षण आंदोलन दस्तक दे चुका है राज्य में पहली बार गुर्जर आरक्षण आंदोलन किया गया वह एक समाज के साथ सामाजिक न्याय का आंदोलन था। कर्नल किरोड़ी सिंह बैंसला इस आंदोलन के अगुआ थे और देश प्रदेश में उनको भारी शोहरत वह एक आंदोलनकारी की पहचान मिली। तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने एक बार आंदोलन को दबाना चाहा फिर समझा-बुझाकर आंदोलन समाप्त करने का प्रयास किया लेकिन आखिर उन्हें गुर्जर आंदोलन के आगे झुकना पड़ा। राज्य सरकार ने गुर्जरों को 1 फ़ीसदी आरक्षण देते हुए केंद्र सरकार के समक्ष गुर्जर को 5 फ़ीसदी आरक्षण की सिफारिश कर दी। देश में कई राज्यों में आरक्षण विरोधी तथा आरक्षण की मांग को लेकर चल रहे आंदोलनों की श्रंखला में गुर्जर आरक्षण अपने आप में सबसे कामयाब आंदोलन रहा जिसने राजस्थान में गुर्जर समाज को आरक्षण सरकार से अनुदान वह देवनारायण बोर्ड की स्थापना के साथ प्रदेश के विभिन्न तहसीलों में ट्रस्ट को जमीनों का आवंटन भी किया गया। गुर्जर समाज में इस आंदोलन के बाद कई नेता सामने आए और अलग-अलग समय पर सरकार के साथ कभी टकराव तो कभी समझौता करने लगे। एक बार फिर गुर्जर आरक्षण आंदोलन परियों पर दिखने लगा है लगभग एक दर्जन ट्रेनों का रूट बदला गया है यह हालात पैदा होने के चलते राज्य के कुछ शहरों में इंटरनेट को भी बंद किया गया है तथा 3 जिलों में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून लागू किया गया है। अब देखने वाली बात यह है कि राजस्थान की कांग्रेस सरकार के उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट जो खुद गुर्जर समुदाय से आते हैं की सरकार से बगावत तथा पार्टी में वापसी के बाद इस आंदोलन की रूपरेखा कैसे और क्यों बनी। राजस्थान में अब गुर्जर समाज के सर्वमान्य नेता के रूप में स्थापित होने के लिए सचिन पायलट कर्नल बैंसला, मंत्री अशोक चांदना, हिम्मत सिंह जैसे कई नेताओं में होड़ लगी है। कर्नल बैंसला उम्र के लिहाज से खुद कम सक्रिय लेकिन उन्होंने अपने पुत्र विजय बैंसला को आगे कर दिया है। सामाजिक आंदोलन अब नेताओं के नाक की लड़ाई बनकर रह गई है। समाज को 5 फ़ीसदी आरक्षण मिल रहा है बड़ी संख्या में राज्य सरकार की नौकरियों में भर्तियां हो चुकी है तथा जिन विभागों में आरक्षण संभव नहीं है वहां इनके लिए सीटों को खाली छोड़ा जा रहा है। इसके बावजूद आंदोलन कर प्रदेश में शांति व्यवस्था कानून व्यवस्था को चुनौती देना अपने आप में लोकतंत्र में मिली आजादी का गलत फायदा उठाना है। सचिन पायलट के चलते पहले भी राजस्थान एक महत्त्व पूरी तरह ठप रहा अब कर्नल बैंसला ने ताल ठोक कर एक बार फिर सरकार व प्रशासन के नाक में दम कर दिया है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत इस आंदोलन के जरिए गुर्जर समाज में दो फाड़ करना चाहते हैं। सचिन पहले से गहलोत की नजरों में चढ़े हुए हैं तथा उनकी प्राथमिकता पहले सचिन पायलट को गुर्जर नेता के फ्रेम में फिट करने की थी अब वह सचिन को गुर्जर समाज का सर्वमान्य नेता भी नहीं रहने देना चाहते। कर्नल बैंसला खुद भारतीय जनता पार्टी से लोकसभा का चुनाव लड़ चुके हैं, उनके सांसद बनने में महज 400 वोट का अंतर रहा था। उधर आंदोलन में सहभागी रहने वाले अशोक चांदना आज राजस्थान के खेल मंत्री हैं। इसके अलावा गुर्जर समाज के कई नेता राजस्थान की राजनीति में अपने पैर जमा चुके हैं इसलिए कर्नल बैंसला अब समय रहते अपने पुत्र विजय बैंसला को भी राजनीतिक शतरंज में उचित जगह पर बिठाने की तैयारी में हैं। गुर्जर समाज का इन नेताओं की आपसी लड़ाई व खींचतान से कोई खास वास्ता नहीं रह गया है।

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