वसुंधरा व सचिन की राजनीति में करता अंतर है??

भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने राष्ट्रीय कार्यकारिणी में राजस्थान को कई बड़े ओहदे देकर काफी महत्व दिया है इससे एक बात साफ होती जा रही है की भाजपा आलाकमान के दिमाग में राजस्थान की राजनीति को लेकर पहले से कोई रणनीति है। पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को फिर से राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया है जबकि पहले से राष्ट्रीय महासचिव के पद पर नियुक्त भूपेंद्र यादव को एक बार फिर यही जिम्मेदारी दी गई है। भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में वसुंधरा राजे ने पहले कभी भाग नहीं लिया और वैसे भी राष्ट्रीय राजनीति कार्यकारिणी में उनका दखल कम ही रहा है। इससे उलट राजस्थान की राजनीति में वसुंधरा राजे अपना पूरा दखल रखती है। राजस्थान में भाजपा के हाल विधायकों में से लगभग 40 विधायक उस के खेमे के माने जाते हैं इसलिए वसुंधरा आज भी राजस्थान में एक ताकतवर नेता के रूप में स्थापित हैं। कांग्रेस से सचिन पायलट के बगावत कर हरियाणा के मानेसर में कैंप करने के दौरान गहलोत सरकार को अगर किसी तरह का नैतिक समर्थन रहा तो वह वसुंधरा राजे गुट की तरफ से था। सचिन को गहलोत और वसुंधरा राजे ने इतना मजबूर कर दिया कि उन्हें अपना सब कुछ गवा कर वापस अपनी पार्टी कॉन्ग्रेस में ही रहना पड़ा। हालांकि सचिन गाहे-बगाहे अपनी लोकप्रियता का डंका बजाते नजर आते हैं लेकिन राजस्थान के नेता व जनता में उनकी खासी किरकिरी हुई है। उनका मुख्यमंत्री पद के लिए जिद करना उनकी एक बड़ी भूल साबित हुई जिसके चलते उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष पद वह राजस्थान सरकार में उप मुख्यमंत्री का पद गवाना पड़ा। राजनीतिक कार्यकर्ता कितना भी तगड़ा समर्थक हो लेकिन अपने नेता की सरकार में पकड़ की नाप तोल जरूर करता है। सचिन के साथ कुछ ऐसा ही हो रहा है उनसे कांग्रेस ही नहीं भाजपा के भी कई नेता नाराज नजर आ रहे हैं। उसमें एक बड़ा कारण उनका राजनीतिक उद्भव भी है। कम उम्र व कम वक्त में सचिन ने राजस्थान में भले अपनी जड़े जमा ली लेकिन उनका बाहरी होना आज भी प्रदेश के नेताओं को अखरता है। यह चुभन तब और उबर कर सामने आई जब कांग्रेस आलाकमान के समक्ष वे मुख्यमंत्री की जिद पर अड़ गए। जयपुर में ही कांग्रेस के पूर्व विधायक व भाजपा के एक पूर्व विधायक की माने तो उनका साफ कहना है कि राजस्थान कोई चारागाह नहीं है। राजस्थान के डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म सचिन को आज भी लोकप्रिय व ताकतवर नेता बताते हो लेकिन अब सचिन के लिए राहें आसान नहीं है। यही स्थिति भारतीय जनता पार्टी में अब वसुंधरा राजे के लिए भी बन रही है। वसुंधरा राजे सचिन से दो कदम आगे बढ़कर अपनी राजनीतिक पकड़ बनाने के साथ अपना एक अलग संगठन खड़ा करने की भी तैयारी में बताई जा रही है। पिछली बार मुख्यमंत्री रहते हैं वसुंधरा राजे ने राजस्थान के हर एक समुदाय जाति व वर्ग के साथ खुद को जोड़ कर अपना एक खास समर्थक समुदाय खड़ा किया है जो अब वसुंधरा राजे के ट्रंप कार्ड का हिस्सा बन सकता है। इससे उलट सचिन एक समुदाय विशेष के नेता की छवि में फंसते नजर आ रहे हैं। सचिन ने कभी इससे दूर होने का संकेत भी नहीं दिया और गहलोत वह कांग्रेस संगठन ने इसी का फायदा उठाने का हालिया प्रयास किया। राजस्थान की राजनीति में आने वाले समय में एक और नए राजनीतिक संगठन को देखने की तैयारी करनी चाहिए। राष्ट्रवादी लोकतांत्रिक पार्टी के नेता हनुमान बेनीवाल ने गत चुनाव में अपनी धमक दिखाई लेकिन वसुंधरा राजे जिस योजना के साथ आगे बढ़ रही हैं वह शायद राजस्थान में पहली बार होगा। भाजपा भी अब तक इसीलिए चुप रही की राजस्थान में कर्नाटक जैसी स्थिति ना हो। प्रदेश में हर 5 साल में वैसे भी भाजपा वह कांग्रेश सत्ता में आती रही है इस बार फिर शायद भाजपा की बारी होगी लेकिन अब देखना यह है कि भाजपा व कांग्रेस शेष बचे 3 साल तक अपना धैर्य बनाकर रखते हैं या नहीं यह इसी बात पर निर्भर करेगा की प्रदेश का अगला मुख्यमंत्री कौन बनना चाहता है और कब बनना चाहता है।

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