दलित भी मीडिया के इस चरित्र से परिचित हैं इसलिए वे इसे मनुवादी मीडिया या मनुस्ट्रीम मीडिया कहते हैं. वे अब उससे कोई अपेक्षा भी शायद नहीं रखते.

सहारनपुर में दलितों पर हो रहे अत्याचारों के ख़िलाफ़ दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन में कितने लोग जुटे थे? पाँच हज़ार, दस हज़ार, पचास हज़ार या एक लाख? मीडिया के महाविस्तार के इस युग में इस सवाल का जवाब आसानी से मिल जाना चाहिए, मगर नहीं मिलेगा. वज़ह यही है कि सच को देखने के मीडिया में चश्मे अलग-अलग हैं.

ख़ास तौर पर अगर वह सच दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों के पक्ष में और सवर्णों तथा उग्र हिंदुओं के ख़िलाफ. हुआ तब तो उसे बताने की कृपा मीडिया नहीं ही करेगा. यही वजह है कि मीडिया के बड़े हिस्से ने जंतर-मंतर के प्रदर्शनकारियों की संख्या को कम करके बताया. उनकी नज़र में पाँच-दस हज़ार लोग थे, जबकि भीड़ के दृश्यों को देखकर कोई भी बता सकता है कि संख्या इससे कहीं ज़्यादा रही होगी. लेकिन मीडिया ने यही नहीं किया बल्कि इस प्रदर्शन को अंडरप्ले भी किया. अधिकांश चैनलों पर ये विशाल प्रदर्शन बड़ी ख़बर नहीं बनी, जबकि इसमें पूरी गुंज़ाइश थी.

ये भी नहीं बताया कि चंद्रशेखर ने दलितों को जागने और फासीवाद से लड़ने के बारे में क्या कहा. अख़बारों का रवैया भी कुछ अलग नहीं था. उन्होंने भी उसे अंदर के पन्नों में फेंक दिया. उनकी दिलचस्पी राजनाथ सिंह के घिसे-पिटे बयान या आईपीएल के फाइनल में अधिक थी. एक अख़बार की सुर्खी तो ये बता रही थी कि दलित अपने फरार नेता के साथ खड़ा होने के लिए इकट्ठी हुई थी.

लेकिन ये पहला मौक़ा नहीं है जब दलितों के प्रदर्शन को मीडिया ने अनदेखा किया या फिर उसे बहुत ही कम कवरेज दिया. लोग इसके कारण भी जानते हैं. मीडिया के स्वामियों और उसमें काम करने वालों की सामाजिक-जातीय पृष्ठभूमि में इसकी सचाई छिपी हुई  ये तो सर्वविदित है कि मीडिया में तथाकथित ऊंची जातियों का वर्चस्व है और वे कमज़ोर जातियों से जुड़ी ख़बरों को हमेशा से नज़रअंदाज़ करती हैं. पत्रकारों की जातिगत निष्ठा भी उसी तरह से पक्की है जैसी कि दूसरे पेशों में.

पाँच मई को सहारनपुर मे दलितों पर ठाकुर बिरादरी के लोगों ने हमला बोला था और पचासों घरों को फूँक डाला था. उसके बाद भी उन्हें धमकाने की हरकतें जारी हैं. उत्तरप्रदेश पुलिस और प्रशासन भी उनके पक्ष में खड़ा है. मगर इस सबकी बहुत कम रिपोर्टिंग मीडिया में हो रही है. सच तो ये है कि योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से दलितों पर अत्याचारों में तेज़ी से बढोतरी आई है, मगर मीडिया इसको लेकर चुप है.

क्या इसलिए कि वह यूपी में सवर्ण के नेतृत्व और सोच वाली सरकार के साथ है? मानने वाले तो ये भी मानते हैं कि मीडिया दलितों के मामलों को दफ़नाने में जुटा हुआ है ताकि केंद्र सरकार के लिए कोई धर्मसंकट न खड़ा हो.

रोहित वेमुला और उना के मामले में उसकी पहले ही काफी छीछालेदर हो चुकी है. फिर आशंका ये भी है कि दलितों का उभार उसकी राजनीति को पटरी से उतार सकता है. वह हिंदुत्व के छाते के तले सभी जातियों को जोड़ना चाहती है मगर सवर्णों को नाराज़ किए बगैर. यानी हिंदू एकता के नाम पर दलित अपनी जगह पर बने रहें, अत्याचार सहते रहें.

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